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वास्तु शास्त्र की कुछ सूत्र

जिस भूमि पर आप निर्माण करना चाहते हैं उसे स्थान की मिट्टी को खुद कर और नई मिट्टी डालने पर भूमिगत किसी भी प्रकार का दूध ठीक हो जाता है

ईशान को ईश्वर का स्थान होता है आपको अपने भवन में ईशान कोण में शौचालय अथवा गंदगी नहीं रखनी चाहिए यह आपकी संपूर्ण जीवनकाल के लिए कष्टदायक होता है

गृह स्वामी का स्थान पश्चिम या दक्षिण में ही बनाएं और जहां तक संभव हो सके दक्षिण पश्चिमी नृत्य पूर्ण में ही बनाएं इससे गृह स्वामी का भारी भरकम सामान भी इसी दिशा पर रखा जा सकेगा

यदि आप अपने घर का विस्तार चारों दिशाओं में करना चाहते हैं तो यह उत्तम है केवल दक्षिण पश्चिम में अथवा दक्षिण पूर्व में विस्तार करने से धन हानि प्लेस आगजनी दुर्घटना चोरी डकैती स्वास्थ्य हानि अनावश्यक चिंता प्लीज आदि बना रहता है

पशु साल आपको भवन में उत्तर पश्चिम दिशा में बनानी चाहिए

पूर्व एवं उत्तर दिशा में घर की खिड़कियां एवं दरवाजे अधिक होने चाहिए दक्षिण पश्चिम की ओर कम होने चाहिए

निर्माण स्थल की भूमिका ढलान उत्तर दिशा में पूर्व दिशा में होना चाहिए जिससे जल का निकास उत्तर पूर्व दिशा में यानी ईशान कोण में हो जाएगा

पूजा अर्चना की समय हमेशा आपका मुख ईशान की ओर उत्तर दिशा की ओर या पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए इससे पूजन अर्चन का आपके संपूर्ण फल प्राप्त होता है

यदि घर से निकलते समय दक्षिण की ओर मुख रहता है तो इससे आपके जीवन में अनावश्यक परेशानी एवं हानि होती है जहां तक हो सके संभव हो इससे आपको बचना चाहिए

भवन अथवा जमीन का ईशान को अन्य पदों से बड़ा हुआ है तो सूर्य सिद्धि एवं सुखों का डाटा है दबा हुआ कोना कष्ट कारक होता है

पार्किंग हेतु उत्तम पश्चिम स्थान प्रयोग में लाना चाहिए

बेडरूम में बेडरूम में मदिरा का सेवन तेल के डिब्बी मुलेठी मुसल अंगीठी कीटनाशक आदि दवाएं नहीं होनी चाहिए इससे मानसिक उद्योग पड़ता है चिंता परेशानी आपको भोगनी पड़ती है

भूमिगत जल भंडारण उत्तर पश्चिम दिशा में करने से वंश वृद्धि में रुकावट आएगी धन हानि के साथ-साथ मानसिक अशांति और अखिलेश से उभरा नहीं जा सकता है उपयुक्त स्थान उत्तर पूर्व दिशा का है

रसोई घर शौचालय तथा पूजा घर एक दूसरे की आसपास कदापि न बनाएं

पंडित दीपक पांडे वास्तु शास्त्री ९३०५३६०३८२

Pt Deepak Pandey vastu shastra consultant


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